गोवर्धन पर्वत की कथा – गोवर्धन की पूजा क्यों कि जाती है

Govardhan parvat ki katha

गोवर्धन पर्वत की कथा गोवर्धन पर्वत का इतिहास महाभारत से जुड़ा है। ये पर्वत मथुरा के पास स्थित है। द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने गोकुल-वृंदावन के लोगों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए प्रेेेरित किया

 

 

श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उंगली पर क्यूं उठाया था 

गोवर्धन पर्वत को गिरिराज जी भी कहा जाता है  , श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर धारण किया था और गोकुल वासियों की इंद्र के प्रकोप से रक्षा की थी  यह कथा कुछ इस प्रकार है

ब्रजबासी इंद्र को अपना देवता मानकर इंद्र देव की पूजा करते थे यह परम्परा ब्रज में वर्षों से पुरखों के समय से चली आ रही थी लेकिन एक दिन जब इंद्र की पूजा का दिन था तो

कृष्ण ने मैया से पूछ की मैया आज ये पकवान किसलिए बनाए जा रहे हैं तब मैया ने कहा कि कान्हा आज के दिन देवराज इंद्र की पूजा की जाती है क्योंकि देवराज हमें जल वर्षा करते हैं उससे हमारा जीवन चलता है और यदि पूजा ना कि जाए तो देवराज क्रोधित हो जाते हैं

 

कृष्ण बोले कि मैया ऐसे देवता को क्यूं पूजा जाए जो अपने भक्तों पर क्रोध करे अगर पूजना है तो हमारी गौ माता को पुजो जो हमें दूध घी माखन देती है और गोवर्धन पर्वत को पुजो जो जिससे गौ को भोजन मिलता है पर्वतों के कारण बादल रुकते है और वर्षांत होती है इसलिए आज से इन्द्र की पूजा नहीं होगी सभी ब्रजबासी गोवर्धन पर्वत की पूजा करेंगे और कोई भी इंद्र से नहीं डरेगा

 

इंद्र को क्रोध आया

इस घटना से इंद्र देव को क्रोध आना ही था तो इंद्र ने भयानक रूप से जल वर्षा कर दी , इससे त्रस्त होकर व्रजवासी कान्हा के पास आए की कान्हा अब आप और आपके गोवर्धन पर्वत ही हमारी रक्षा करो , लेकिन इंद्र को ये पता नहीं था कि मैं जिसे ग्वाला समझ रहा हूं वो श्रृष्टि का पालनहार है ।

 

कृष्णा भगवान ने सभी व्रजवासियों की रक्षा करने के लिए गोवर्धन पर्वत की अपनी उंगली पर उठाया और सारे ब्रजवासियों की इंद्र के प्रकोप से रक्षा की , इस चमत्कार को देखकर इंद्र ने भगवान कृष्ण से क्षमा मांगी और तभी से सारे ब्रजबासी इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे इसी कारण कृष्णा का नाम गिरधर पड़ा क्यूंकि उन्होंने गिर को धारण किया था ।

 

गोवर्धन की महिमा कलियुग में भी है 

गोवर्धन पर्वत आज कलियुग में भी बहुत पूज्यनीय है ऐसा माना जाता है कि जो भी व्यक्ति गोवर्धन की परिक्रमा करने जाता है उसकी मनोकामना जरूर पूर्ण होती है इसलिए एक बार जीवन में इस पवित्र धाम के दर्शन जरूर करने चाहिए

 

परिक्रमा की शुरुआत वैष्णवजन जाति-पुरा से और सामान्यजन मानसी गंगा से करते हैं और पुन: वहीं पहुंच जाते हैं। पूंछरी का लौठा में दर्शन करना आवश्यक माना गया है, क्योंकि यहां आने से इस बात की पुष्टि मानी जाती है कि आप यहां परिक्रमा करने आए हैं।

 

यह अर्जी लगाने जैसा है। पूंछरी का लौठा क्षेत्र राजस्थान में आता है। यहां पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम मित्र को वरदान दिया था कि तुम्हे कुछ नहीं होगा और हमेशा जीवित रहोगे। तभी से ऐसा माना जाता है कि यहां लौठाजी तपस्या में लीन है। यह पूरी परिक्रमा 7 कोस अर्थात लगभग 21 किलोमीटर है।

 

ऋषि पुलस्त्य और गोवर्धन पर्वत की कथा 

माना जाता है कि 5000 साल पहले यह पर्वत 30 हजार मीटर ऊंचा हुआ करता था. अब इसकी ऊंचाई बहुत कम हो गई है. इसके रोज घटने के पीछे भी एक रोचक कहानी है.

 

एक बार पुलस्त्य ऋषि गोवर्धन पर्वत की सुंदरता देखर बहुत मोहित ही गए और इस पर्वत को अपने साथ ले जाने के लिए द्रोनाचल पर्वत से आग्रह किया लेकिन गोवर्धन पर्वत ने एक शर्त रखी कि आप जहां मुझे रखा दोगे में वहीं स्थापित ही जाऊंगा ,

ऋषि पुलस्त्य अपने तपोबल ने इस पर्वत की अपनी हथेली पर उठाकर ले जाने लगे रास्ते में  ब्रज भूमि आयी तो गोवर्धन पर्वत ने अपना बजन बढ़ा लिया जिससे ऋषि पुलस्त्य ने इसे रखकर विश्राम कर लिया

 

जब विश्राम करने के बाद ऋषि फिर से पर्वत को ले जाने लगे तो पर्वत हिला भी नहीं तो गोवर्धन ने कहा कि हे ऋषिवर मैंने जो शर्त रखी थी आप उसका पालन करो अब मैं यहां से कहीं नहीं जा सकता तो  पर ऋषि ने गोवर्धन पर्वत के शाप दिया कि तू प्रतिदिन नष्ट होगा और उसी दिन से गिरिराज पर्वत की ऊंचाई कम हो रही है ऐसा माना जाता है कि कलियुग के अंत तक गोवर्धन समाप्त हो जाएगा

 

यह थी  की किस तरह गोवर्धन पर्वत को कृष्ण भगवान ने पूजनीय बना दिया और ऋषि पुलस्त्य के शाप के कारण गोवर्धन पर्वत की ऊंचाई कम होती जा रही है , यदि आप भी गोवर्धन कि महिमा को बहुत नजदीक से देखने चाहते है तो एक बार गीवर्धा  जी जरूर जाएं जय श्री कृष्णा

 

 

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