एल्गार परिषद मामला , भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ना चाहते थे आरोपी’, NIA का दावा

 

एल्गार परिषद मामला 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित एक सम्मेलन में दिए गए भड़काऊ भाषणों से संबंधित है, जिसके बारे में पुलिस ने दावा किया कि इस भाषणों के कारण अगले दिन पश्चिमी महाराष्ट्र शहर के बाहरी इलाके में स्थित कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई. अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि इस सम्मेलन को माओवादियों के साथ कथित रूप से संबंध रखने वाले लोगों ने आयोजित किया था.

 

एल्गार परिषद-माओवादी लिंक

एनआईए के अधिकारियों ने कहा कि आरोपियों का कथित इरादा हिंसा को उकसाना और कानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति असंतोष फैलाना, साजिश करना, अव्यवस्था पैदा करना था ताकि भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को खतरा हो।

मसौदा मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता कार्यकर्ताओं सहित 15 आरोपियों के खिलाफ 17 आरोप लगाता है, और उन पर कड़े गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाने की मांग की गई है।

 

एल्गार परिषद क्या है 

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र शरजील उस्मानी ने हाल ही में पुणे के एलगार परिषद के सम्मेलन में कहा था कि हिन्दुस्तान में हिन्दू समाज सड़ चुका है. जुनैद को चलती ट्रेन में मारते हैं, कोई बचाने नहीं आता है. ये जो लोग लिंचिंग करते हैं, कत्ल करते हैं. अगले दिन फिर किसी को पकड़ते हैं, फिर कत्ल करते हैं और नॉर्मल लाइफ जीते हैं. इसके अलावा भी शरजील उस्मानी ने हिन्दू समाज के लिए आपत्तिजनक बातें कही थी.

 

एल्गार परिषद मामला

एनआईए ने आरोप लगाया है कि आरोपी प्रतिबंधित आतंकी संगठन भाकपा (माओवादी) के सक्रिय सदस्य थे, मामले में गिरफ्तार आरोपियों में कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज, वर्नोन गोंजाल्विस, वरवर राव, हनी बाबू, आनंद तेलतुम्बडे, शोमा सेन, गौतम नवलखा और अन्य शामिल हैं।

मसौदा आरोपों के अनुसार, अभियुक्तों का मुख्य उद्देश्य “राज्य से सत्ता हथियाने के लिए क्रांति और सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से जनता सरकार (जनता की सरकार) ” स्थापित करना था ।मसौदे में यह भी दावा किया गया कि आरोपियों ने “भारत और महाराष्ट्र की सरकारों के खिलाफ युद्ध छेड़ने” का प्रयास किया।

मामले में मुकदमा शुरू होने से पहले आरोपों का निर्धारण पहला कदम है, जहां अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों के साथ-साथ सबूतों पर भरोसा करने का वर्णन करता है. आरोप तय होने के बाद अदालत आरोपियों से पूछेगी कि उन्होंने मामले में अपना गुनाह कबूल किया है या नहीं।

 

साजिश भारत के क्षेत्र के एक हिस्से को अलग करना

आगे दावा किया गया कि आरोपी उत्तेजक गाने बजा रहे थे, एल्गार परिषद की बैठक के दौरान पुणे में लघु नाटक और नाटक कर रहे थे और माओवादी साहित्य वितरित कर रहे थे, यह कि आपराधिक साजिश भारत के क्षेत्र के एक हिस्से को अलग करने और लोगों को इस तरह के अलगाव लाने के लिए उकसाने का इरादा था,” यह कहा।

 

आरोपी का इरादा विस्फोटक पदार्थों का उपयोग करके लोगों के मन में आतंक फैलाने का था। “उस आरोपी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्रों को आतंकवादी गतिविधियों के लिए भर्ती किया था।”

 

एल्गार परिषद मामला

आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (साजिश), 115 (अपराध के लिए उकसाना), 121, 121-ए (राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ना), 124-ए (देशद्रोह), 153-ए (जुलूस में हथियार) के तहत आरोप लगाए गए हैं। ), 505 (1) (बी) (शरारत को बढ़ावा देने वाले बयान) और 34 (सामान्य इरादे)।उन पर यूएपीए की धारा 13, 16, 17, 18, 18ए, 18बी, 20 (आतंकवादी गतिविधियों के लिए सजा), 38, 39 और 40 (आतंकवादी संगठन का हिस्सा होने की सजा) के तहत भी आरोप लगाए गए हैं।

 

क्या है एल्गार परिषद मामला

एल्गार परिषद मामला पुणे में 31 दिसंबर 2017 को एक सभा में कथित भड़काउ भाषण देने से संबंधित है। पुलिस का दावा है कि उक्त भाषण के बाद पश्चिमी महाराष्ट्र के बाहरी इलाकों में कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा भड़की थी। पुणे पुलिस ने दावा किया था कि सभा को माओवादियों का समर्थन प्राप्त था। मामले की जांच अब एनआईए कर रही है। इसमें कई कार्यकर्ताओं और अकादमिक जगत के लोगों को आरोपी बनाया गया है।

 

 

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